लेखक- जितेन्द्र मित्तल

यह नाटक दुःखी, पीड़ित और बेबस मानवता को समर्पित है। यह नाटक समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जहाँ एक ओर ऐसे लोग हैं जिनके पास धन, यश और वैभव की कोई कमी नहीं, फिर भी वे गंभीर बीमारियों के कारण असहनीय पीड़ा में जीवन जीने को मजबूर हैं। किसी का हृदय, किसी का गुर्दा तो किसी का पैंक्रियाज़ जवाब दे चुका है। वे दुनिया की हर वस्तु खरीद सकते हैं, पर अपने जीवन का समाधान नहीं।
 
दूसरी ओर यह नाटक उन असंख्य गरीब लोगों की व्यथा को भी सामने लाता है, जो इन्हीं बीमारियों के साथ-साथ भूख, अभाव और लाचारी से जूझ रहे हैं। अन्न के एक दाने के लिए तरसते ये लोग हर पल मृत्यु के साये में जीते हैं। यह नाटक स्पष्ट करता है कि दुःख का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन उसका मूल कारण एक ही है—मानव अंगों की अपूरणीयता। न तो उन्हें खरीदा जा सकता है, न बेचा जा सकता है और न ही किसी शक्ति या सत्ता के बल पर पाया जा सकता है।
 
यह नाटक इस सार्वभौमिक सत्य को रेखांकित करता है कि प्रकृति के आगे मानव कितना असहाय है। तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद मनुष्य आज भी मानव अंगों की प्रतिकृति नहीं बना पाया है। ऐसे में अंगदान ही एकमात्र ऐसा मानवीय विकल्प है, जो किसी के जीवन में आशा का संचार कर सकता है।
 
यायावर रंगमण्डल द्वारा प्रस्तुत यह नाटक मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और परिवर्तन के उद्देश्य से रचा गया है। यह नाटक मानता है कि मात्र मंच पर प्रस्तुति से समाज तुरंत नहीं बदलेगा, लेकिन यदि इससे दर्शकों के मन में प्रश्न उठते हैं, बहस होती है और अंगदान पर सोच विकसित होती है, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। यह नाटक दर्शकों को संवेदनशील बनाते हुए उन्हें मानवता के पक्ष में खड़ा होने का आह्वान करता है।

प्रतिभागी कलाकार:
योगेन्द्र जोशी, सोनल ठाकुर, रमाकांत शुक्ला, मुकेश शुक्ला, प्रवीन चन्द्रा, संजय तिवारी, अनूप ठाकुर, दीपक, चंचला चटर्जी, मनोज सिंह, अमन वर्मा, अतुल वर्मा, विशाल, अनवर, मलय दत्ता, रोहित चौधरी|
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