यायावर रंगमंडल की स्थापना वर्ष 1991 में लेखक, अभिनेता एवं निर्देशक जितेन्द्र मित्तल द्वारा की गई थी। यायावर रंगमण्डल लखनऊ स्थित एक प्रतिष्ठित और सक्रिय सामाजिक रंगमंच संस्था है, जो कई दशकों से जनचेतना और सांस्कृतिक जागरूकता के क्षेत्र में निरंतर कार्यरत है। यह संस्था रंगमंच को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और जनसंवाद का शक्तिशाली साधन मानती है।
यायावर रंगमंडल ने नुक्कड़ नाटक, मंच नाटक, बाल नाट्य प्रस्तुतियाँ और जनसरोकार से जुड़े रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँच बनाई है। संस्था ने “श्री सेंचुरी बुड्ढा”, “ततुरूपचाल”, और “सलीम शेरवानी की शादी” जैसे नाटकों की अनेक प्रस्तुतियाँ देश के विभिन्न शहरों में दी हैं।
यायावर रंगमण्डल की एक विशिष्ट पहल “स्क्रिप्ट बैंक सेवा” भी रही है, जिसके अंतर्गत देशभर के रंगमंच समूहों को नि:शुल्क नाट्य-पांडुलिपियाँ उपलब्ध कराई गईं, जिससे स्वतंत्र और क्षेत्रीय रंगमंडलों को सशक्त सहयोग मिल सका।
यह संस्था रंगमंच को पारंपरिक सभागारों की सीमाओं से बाहर निकालकर आम जनजीवन के और अधिक निकट लाने के लिए जानी जाती है। सार्वजनिक स्थानों, विद्यालयों, कारागारों और ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित प्रस्तुतियों के माध्यम से यायावर रंगमण्डल ने रंगमंच को सामाजिक परिवर्तन, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों का प्रभावी माध्यम बनाया है।
इस संस्था का एक महत्वपूर्ण योगदान कारागारों में आजीवन कारावास भुगत रहे बंदियों के साथ सांस्कृतिक कार्यशालाओं का आयोजन रहा है, जिससे रंगमंच को सुधार और पुनर्वास का माध्यम बनाया गया। यायावर रंगमण्डल ने अब तक दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, जयपुर, चंडीगढ़, हैदराबाद सहित देश के अनेक शहरों में 900 से अधिक प्रस्तुतियाँ दी हैं।
बाल रंगमंच शिविर, कार्यशालाएँ, नाट्य महोत्सव और सामाजिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से यह संस्था लगातार युवा प्रतिभाओं को मंच प्रदान कर रही है।
यायावर रंगमण्डल का विश्वास है कि रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने की एक जीवंत प्रक्रिया है।
जीतेन्द्र कुमार मित्तल
जितेन्द्र मित्तल एक प्रसिद्ध नाटककार और थिएटर व्यक्तित्व थे। उन्होंने 1977 में भारतेन्दु नाट्य केंद्र से प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1999 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया।
उन्होंने कई चर्चित नाटक लिखे, जिनमें मंत्रिमंडल, प्यादा, बचपन, नंगी आवाज़ें, अपने-अपने अफ़ताब आदि शामिल हैं। ये नाटक न केवल प्रकाशित हुए बल्कि कई बार मंचित भी किए गए।
निर्देशन के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने कई प्रमुख नाटकों का निर्देशन किया, जैसे कोई नाम नहीं, तुरुप का इक्का, बिखरती आकृतियाँ, पैर तले की ज़मीन, ढाई अक्षर प्रेम का, शी…ऽऽ…सेन्चुरी बुड्ढा आदि।
बाल नाटकों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने नटखट मुरगा लिखा और मंचित किया, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सरकारी सेवा के साथ-साथ, उन्होंने दूरदर्शन के लिए 250 से अधिक स्क्रिप्ट लिखीं और 60 बाल फिल्मों का निर्माण किया। समाजसेवा में भी वे सक्रिय रहे – उन्होंने जेल में कार्यशालाएँ आयोजित कीं और अंगदान के लिए विशेष नाटक बनाए, जिन्हें पूरे देश में 99 प्रदर्शन किए गए।
जितेन्द्र मित्तल यायावर रंगमंडल के संस्थापक थे और उन्होंने लखनऊ में पेशेवर नाटक श्रृंखला की शुरुआत की, जिससे आम जनता थिएटर की ओर आकर्षित हुई। उनके योगदान को विभिन्न पुरस्कारों से भी सराहा गया, जैसे रंगयात्रा सम्मान 1998) और बी.एम. शाह अवार्ड (1999)।
जितेन्द्र मित्तल ने रंगमंच के माध्यम से सामाजिक मुद्दों, मानवीय संवेदनाओं और यथार्थवादी कथ्य को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में योगदान दिया है। उनका काम यह दर्शाता है कि रंगमंच केवल मंचीय अभिनय नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच और सामूहिक चेतना का निर्माण भी है।
यायावर रंगमंडल के साथ जितेंद्र मित्तल जी की भूमिका रंगकर्म की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है, जो कला को समाज से जोड़ती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है। उनका योगदान हिंदी रंगमंच की समृद्ध परंपरा में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है।
jetendra mittal yayaver rangmandal
पुनीत मित्तल एक युवा रंगकर्मी हैं, जो मूवमेंट को कथा-कहने की जीवंत और प्रभावशाली भाषा में बदल देते हैं। फिज़िकल थिएटर, मूवमेंट रिसर्च और डांस-ड्रामा में एक दशक से अधिक अनुभव के साथ वे ऐसी प्रस्तुतियाँ रचते आ रहे हैं जो केवल देखी नहीं जातीं, बल्कि गहराई से अनुभव की जाती हैं।
स्टूडियो की सूक्ष्म खोजों से लेकर बड़े मंचों की भव्यता तक, उनकी दृष्टि सटीकता और कल्पना का सुंदर संगम है। वे मानते हैं कि मानव शरीर ही मंच का सबसे सच्चा माध्यम है, जो उन सच्चाइयों को प्रकट कर सकता है जिन्हें शब्द अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते।
फिज़िकल थिएटर और समकालीन मूवमेंट पर आधारित उनके मंचन में
हाव-भाव, लय, साँस और स्थान मिलकर ऐसी कथाएँ रचते हैं जो दर्शकों के भीतर गहराई तक उतर जाती हैं। उनके पात्र केवल बोलते नहीं, वे जीते हैं, महसूस करते हैं, और अपनी आंतरिक दुनिया को शरीर की भाषा से व्यक्त करते हैं।
यायावर रंगमण्डल के निदेशक के रूप में वे कलाकारों को खोज, प्रयोग और नई मूवमेंट-भाषाओं की दिशा में प्रेरित करते हैं। उनकी रिहर्सल स्पेस कल्पना की प्रयोगशाला बन जाती है, जहाँ निरंतर अभ्यास से सच्ची, साहसिक और नए आयामों वाली कहानियाँ जन्म लेती हैं।
पुनीत का नाट्य-निर्माण मनोरंजन के साथ-साथ विचारों को जगाता है, भावनाओं को आंदोलित करता है,
और ऐसा अनुभव रचता है जिसे दर्शक पर्दा गिरने के बाद भी अपने भीतर संजोए रखते हैं।
मोहम्मद हफ़ीज़
मोहम्मद हफ़ीज़ भारतीय रंगमंच के वरिष्ठ निर्देशक, अभिनेता और रंगमंचीय तकनीक विशेषज्ञ हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में चार दशकों से अधिक का अनुभव है। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में आरम्भ हुए अपने करियर के साथ, वे अभिनय, तकनीकी रंगमंच और अभिनेता प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक मार्गदर्शक हैं।
1980 से अब तक उन्होंने 50 से अधिक नाट्य प्रस्तुतियों का निर्देशन किया है और 150 से अधिक रंगमंच प्रस्तुतियों में अभिनय किया है। मंच प्रकाश व्यवस्था और तकनीकी डिज़ाइन में उनकी विशेष दक्षता मानी जाती है। अब तक वे 5,000 से अधिक नाटकों, नृत्य नाटिकाओं, बैले, पपेट शो और बड़े पैमाने पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की लाइट डिज़ाइनिंग और संचालन कर चुके हैं।
एक समर्पित शिक्षक के रूप में, वे 1991 से विद्यालयों और संस्थानों के लिए प्रस्तुति-आधारित बाल रंगमंच कार्यशालाओं का संचालन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने लखनऊ केंद्रीय कारागार में आजीवन कारावास की सजा काट रहे निवासियों के साथ 40 दिवसीय कार्यशाला का नेतृत्व किया, जिसमें उन्होंने “जिसकी लाठी भैंस उसी की” नाटक का निर्देशन किया।
उनका कार्य सिनेमा और टेलीविजन तक विस्तृत है। उन्होंने Road to Sangam, Ishqzaade, Bullet Raja, Lucknavi Ishq और T for Taj Mahal जैसी फ़िल्मों में कार्य किया है, साथ ही अनेक टेलीविजन धारावाहिकों और टेलीफिल्मों में भी योगदान दिया है।
रंगमंच और अभिनय के क्षेत्र में उनके आजीवन योगदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, मंचकृति सम्मान, तुलसी सम्मान, स्व. सुरेश दलवानी स्मृति सम्मान, युवा प्रतिष्ठान पुरस्कार और मितवा थिएटर अवार्ड जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया है।
आज भी मोहम्मद हफ़ीज़ यायावर रंगमण्डल के माध्यम से कलाकारों की पीढ़ियों को गढ़ रहे हैं और अनुशासन, सृजनात्मकता और मंच के प्रति सेवा की एक समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ रंगमंच केवल अभिनय नहीं, बल्कि सत्य, साधना और सामाजिक सहभागिता का जीवन-दर्शन है।

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