शी…ऽऽ…सेन्चुरी बुड्ढा
लेखक: मनोज मित्र (उर्फ बगिया बांछाराम)
निर्देशक: जितेन्द्र मित्तल
यह नाटक शोषक और शोषित के संघर्ष को दर्शाता है। बूढ़ा माली बांछाराम अपनी बगिया से गहरा प्रेम करता है, जबकि जमींदार नौकौड़ी दत्त उसे जबरन हड़पने की कोशिश करता है। उसकी हर कोशिश विफल रहती है, और अंततः वह मृत्यु को प्राप्त होता है।
मरने के बाद भी जमींदार का भूत बूढ़े माली को सताता रहता है। वहीं, समाज के छोटे-मोटे लोग—चोर, नाई, महाजन—अपने स्वार्थ के लिए बांछाराम को जीवित रखना चाहते हैं, जबकि जमींदार उसे नष्ट करने की फिराक में रहता है।
मूल नाटक बंगाली लेखक मनोज मित्र का है। यह हास्य और मनोरंजन से भरपूर है, जिसमें भूत-प्रेत और अंधविश्वास की मजेदार दुनिया दिखाई गई है। इसके साथ-साथ सच और झूठ, शोषण और संघर्ष की जद्दोजहद भी बुनी गई है।
अंततः जमींदार की मृत्यु होती है और बांछाराम के घर में नई पीढ़ी आने की उम्मीद जगती है, यह उन कुचले हुए लोगों के लिए आशा की किरण बनकर उभरती है।
निर्देशक: जितेन्द्र मित्तल
यह नाटक शोषक और शोषित के संघर्ष को दर्शाता है। बूढ़ा माली बांछाराम अपनी बगिया से गहरा प्रेम करता है, जबकि जमींदार नौकौड़ी दत्त उसे जबरन हड़पने की कोशिश करता है। उसकी हर कोशिश विफल रहती है, और अंततः वह मृत्यु को प्राप्त होता है।
मरने के बाद भी जमींदार का भूत बूढ़े माली को सताता रहता है। वहीं, समाज के छोटे-मोटे लोग—चोर, नाई, महाजन—अपने स्वार्थ के लिए बांछाराम को जीवित रखना चाहते हैं, जबकि जमींदार उसे नष्ट करने की फिराक में रहता है।
मूल नाटक बंगाली लेखक मनोज मित्र का है। यह हास्य और मनोरंजन से भरपूर है, जिसमें भूत-प्रेत और अंधविश्वास की मजेदार दुनिया दिखाई गई है। इसके साथ-साथ सच और झूठ, शोषण और संघर्ष की जद्दोजहद भी बुनी गई है।
अंततः जमींदार की मृत्यु होती है और बांछाराम के घर में नई पीढ़ी आने की उम्मीद जगती है, यह उन कुचले हुए लोगों के लिए आशा की किरण बनकर उभरती है।
